समीक्षा / Review

प्रिय की ‘पावती कौन देगा’

ये पाठकीय प्रतिक्रिया प्रिय की पुस्तक “पावती कौन देगा” की पावती देने का एक विनम्र प्रयास भर है। कुछ बरस हुए जब सोशल मीडिया की दीवारों पर व्यंग्य जैसी खुराफात करने वाले एक गैंग के सदस्य प्रिय ने चौराहे पर चाट खाती एक चंद्रमुखी की ऐसी चटपटी झलक दिखाई कि फेसबुक पर उनके ठेले पर मंडराने का चस्का हमें भी लग गया। ऊपर जिस गैंग का जिक्र हुआ है उसके मेंबरान घातक किस्म की विट से लैस थे। हास्य की चिंगारियां उड़ाते गद्य के टुकड़े और विसंगति-ध्वंसक मुहावरों का जखीरा था इनके पास। ये लोग अपनी अभिव्यक्ति से हँसाते तो तिलमिला भी देते थे और इसी वजह से आश्वस्त नहीं थे कि उनकी लिखी ये खुराफ़ाती इबारतें हिंदी व्यंग्य की बासी उपलों से अटी दीवार पर चिपक पाएंगी या नहीं। प्रिय और शंखधर दुबे सालों तक अपने वाल पर छोटे-बड़े विस्फोट करते रहे किंतु उनके आयुधों की किट अर्थात कोई व्यंग्य संग्रह नहीं आया। हालाँकि हिंदी व्यंग्य के दरवाजे पर पीटने के स्तर की इनकी दस्तक अनसुनी नहीं रही क्योंकि सैकड़ों की संख्या में पाठक सोशल मीडिया के रिवाज़ों के अनुरूप उन्हें अपने कंधों पर उछालते भी दिखे। शंखधार की शंकाएं शायद अभी बनी हुई हैं, पर हमारी खुशक़िस्मती से प्रिय उससे उबर कर हमारे लिए ये संग्रह ले आए हैं। इस संग्रह के बहाने उनसे भेंट भी हुई, जिसमें किताब सौंपते हुए उन्होंने मुझ पर प्रेरणा देने का आरोप भी लगाया। मैं इससे मुकरते हुए यहाँ ये बयान दे रहा हूँ।
मेरे तईं ये किताब इसलिए भी खास है कि ये फेसबुकिया चाट के उनके ठेले पर मिलते दोने की जगह एक भरापूरा गर्मागर्म प्लैटर है। किताब क्या है व्यंग्य-मानस का सुन्दर कांड है, जब जी चाहे जहाँ-तहाँ से पलटकर एक पाठ कर लो। हर पाठ में नये-नये अर्थ निकलते हैं। इसमें महज नई हिंदी का दावा नहीं है बल्कि नयी समझ, नये मुहावरे, नयी शैली की अभिव्यक्ति में इस काल-खंड में तमाम उलट-पुलट गई चिंतनधाराओं, मान्यताओं और विश्वासों की परतों में दुबकी विसंगतियो को एक अलग अंदाज में, लेकिन शास्त्रीय व्यंग्य के नियम और शर्तों को पूरा करते हुए उधेड़ा, कोंचा और कई जगह तो कूंचा गया है। प्रिय विशद् अध्ययन के जरिए सभी जरूरी आयुध जमा कर इस समर पर निकले हैं और अपने ज्ञान के तरकश से सटीक तीर निकाल कर लक्ष्य भेद लेते हैं। इस अभियान में रूखी-सूखी भाषा से काम नहीं चलता सो शब्दों और वाक्य-विन्यास को तरल व लचीला रखते हुए, विविध शैलियों पे नर्तन-सा करते, शब्दों से अठखेलियां करते हैं। कभी-कभी बहक कर कुछ लक्ष्मण रेखाएं लांघ भी जाते हैं। हालांकि बहकने का आरोप “कविता का सौंदर्यशास्त्र” शीर्षक जिस रचना पर लग सकता है, उसमें भी सच के ढेरों तत्व मौजूद हैं। प्रिय बस अपनी मस्ती में किसी-किसी तरफ बाड़ फलाँगते नज़र आते हैं।

       लेखक – प्रिय

 

इस संग्रह में प्रियोस्की और भोगीलाल व्यंग्य के लिए इस बेहद कठिन दौर में हमारे लिए ‘विसंगति उद्घाटन एण्ड भंजन मेड ईज़ी’ करते नजर आते हैं। इन दिनों के चलन के मुताबिक दिमाग को गिरवी रखकर रील-नद में छप-छप करते हुए इस किताब का रस तो नहीं लिया जा सकता। ऐसी परिस्थिति में जब विडंबनाएं ही डिफ़ॉल्ट (सामान्य स्थिति) हो गई हों, खुद व्यंग्य भी एक विसंगत शैली में लिखा जाता नजर आये तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। व्यंग में जिसे सपाटबयानी कहा जाता है अब व्यक्तिपरक चुटकुलों में (स्टैन्ड-अप कॉमेडी या फूहड़ कवि-सम्मेलनों में) नजर आने लगा है। इन पर प्रतिक्रियाएं भी गाली और ठुकाई-पिटाई की ठोस शैली में आ जाती हैं। इनसे बचने में दिक्कत ये है कि ऐसा व्यंग्य लिखने से भी क्या फायदा जो लक्ष को समझ ही न आये। ये दिक्कत तब और बड़ी हो जाती है जब लक्षित विसंगति का स्रोत मुस्कुराते हुए डंडाधारी समीक्षकों का एक झुंड को यह कह कर आपकी तरफ भेज दे कि आपके व्यंग्य ने उसकी और उसके अनुगामियों की आस्था को चोट पहुँचाई या भावनाओं को आहत किया है। इन व्यंग्य रचनाओं में अद्भुत ह्यूमर की परतों में बरते गए विषयों की गंभीरता तभी समझी जा सकती है जब मन-मस्तिष्क को इस दौर के पूर्वाग्रहों से मुक्ति दिला कर पढ़ा जाए। इन रचनाओं में हमारा पूरा परिवेश मानवीयता के नजरिए से परख कर सामने लाया गया है। व्यंग्य के नाम पर इस दौर के एक छोर पर मसखरी है तो दूसरे पर खामख्वाह ओढ़ी हुई गंभीरता। प्रिय का ये संग्रह हिन्दी व्यंग्य की इस विचित्र स्थिति का एक सम्यक समाहार है।
संग्रह की तमाम रचनाओं में मेरी समझ से कोई भी हल्की नहीं है, चाहे एकाध कैजुअल-सी दिखती हों। इसलिए एकाध उदाहरण देने से किताब का मर्म उद्घाटित नहीं होगा। प्रिय की वैचारिक प्रतिबद्धता और ह्यूमर में छिपी गहराईयों के कुछ नमूने पेश किये जा सकते हैं, जैसे एक रचना में “उसकी अदा निराली थी” ये बताने के क्रम में आज के सरकारी ध्यान-भटकाऊ अभियानों के पोल परत दर परत खुलते हैं- “…. वह बातों की बंसी बजाता और जनता गोकुल की गायों की तरह उसके पीछे चली आती उसके बाद उसके सदके में व्यक्ति उसे अपना लोकतंत्र, अपनी स्वतंत्रता, अपने अधिकार सब सौंप देता है। उसके अभिनय पर अपना बुद्धि विवेक न्योछावर कर देता….”। संग्रह की पहली ही रचना “अरुण यह मधुमेह देश हमारा” में प्रिय कहते हैं, “एक दिन किसी खादी कुत्ते वाले ने उनका हाथ थाम कर कहा, चेले यह मधुमेह देश हमारा। बस उस दिन से उनकी जिंदगी बदल गई। वे देश के मधु को ताड़ गए। अब वे ये सब गलत काम नहीं करते हैं। करवाते हैं। वे राजधानी में मधु उतारते हैं।”
इस संग्रह में कुछ शुद्ध हास्य रचनाएं भी हैं जैसे “मदन जी का मधु उत्सव” और “भारतीय रेल का तख्ते ताऊस”। बाकी जैसा मैंने ऊपर कहा एक आध रचनाओं का जिक्र कर हास्य व्यंग्य के इस प्लेटर के हर कोने के तीखे-मीठे अनोखे स्वाद की झलक नहीं दी जा सकती। व्यंग्य पढ़कर मन में कुलबुलाहट पैदा करने के शौकीन इस किताब को पकड़ कर अच्छे बच्चे की तरह आद्योपांत पढ़ें, तभी इसका सार ग्रहण कर पाएंगे।
प्रकाशक- युवान बुक्स
मूल्य- 299

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