आलेख / Article

होलिका- पितृसत्ता का उन्मादी नृत्य – नीलिमा चौहान

‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ जैसी विचारोत्तेजक और बहुचर्चित किताब की लेखिका नीलिमा चौहान ने होली की ‘परंपरा’ को स्त्री दृष्टि से देखा है। इस आलेख में वे ‘होलिका दहन’ को पितृसत्ता के दमनकारी स्वभाव का प्रकटन मानती हैं। वे इसे ‘विच हंट’ का एक रूप मानती हैं और भाषा के भीतर भी उपस्थित मस्कुलैनिटी को रेखांकित करती हैं। जायज़ सवाल है कि चुड़ैल, डायन जैसे शब्दों के पुल्लिंग रूप क्यों नहीं हैं? यह आलेख होली को पुरुषवादी सत्ता, दमन और हिंसा की अभिव्यक्ति के विस्तार के रूप में देखने की तार्किक मांग करता है और नये सवाल उठाता है।

रंग में भंग वाली बात हो जाएगी अगर मैं कहूँ कि होली पुंसवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उग्र प्रदर्शन है। यह स्त्रियों की ताक़त से आतंकित समाज के सांस्कृतिक अवचेतन के मर्दाना पक्ष का विद्रूप अट्टहास है। लाहौल विलाकुव्वत! ऐन होली के रोज़ रंग-मस्ती-सद्भाव ‘बुरा न मानो सब एक हैं’ की पैकेजिंग का लिहाज़ न करते हुए भला होली में होली पर ऐसा कीचड़ क्योंकर उछालना? 

‘छोटे मुँह बड़ी बात’ वाली बात हो जाएगी अगर मैं कहूँ कि लैंगिकता की आदि लड़ाई में स्त्रियों के आत्मिक व भावात्मक बल के आगे खुद को अदना पाने की प्रतिक्रिया में पितृसत्ता ने अपनी छाती पर जो कवच उगाए, होली उसी का हिस्सा है। पितृसत्ता ने स्त्री की क्षमता को एक ऐसे दुश्मन की तरह पहचाना, जिससे आमने-सामने की लड़ाई में हराकर उसपर स्वामित्व पाना दुष्कर था। उसने स्त्री को बांधा— प्रेम, देवीत्व और त्याग के अदृश्य बंधनों में। फिर इस छवि के विरोधाभास में गढ़ीं बुरी, घातक, मायाविनी, अवांछित स्त्रियाँ। किए इन स्त्रियों के नामकरण- डायन और चुड़ैल जैसे।

दानवी और राक्षसी की एक दैहिक पहचान होती है लेकिन डायन और चुड़ैल आम औरतों के झुण्ड में छिपकर परिवार, जाति, समाज का नाश करने वाली अतिगुप्त औरताना अभिशाप हुआ करती हैं। क्या ही सितम है की राक्षसी और दानवी के लैंगिक विपर्यय राक्षस और दानव तो होते हैं पर डायन और चुड़ैल के पुल्लिंग होते ही नहीं। तो कहना यह की होली का उत्सव होलिका नामक वंश-धातिनी, समाज-द्रोहिणी स्त्री को समाज के सामने बेनक़ाब कर उसे भरी सभा, भरे चौक पर दंड देने के बाद पाई हुई मर्दाना राहत का नाम है।

भितरघात और पारिवारिक-सामाजिक अपराध तो पुरुष भी करता आया है पर वह डायन या चुड़ैला नहीं हुआ! समाज और जाति का अहित तो पुरुष भी करता आया पर उसके दंड का प्रावधान सांस्कृतिक जश्न का सबब नहीं बनने पाया! क्या डायन और चुड़ैल कहलाई स्त्रियों के अपराध और आपराधिक तकनीकें ख़ास या औरताना थीं? जी, थीं। डायन और चुड़ैल के अपराध गुप्ततम होते हैं; वे वैवाहिक धोखे करती हैं, पारिवारिक परंपराओं का अपमान और खंडन करती हैं, अपवित्र मक़सदों के चलते परिवार व समाज के नवजातों की क्षति करती हैं, वे परिवार व समाज की आँखों को धोखा देकर उसकी जड़ों को अपनी अनिष्टकारी शक्तियों से जर्जर कर देती हैं। ऐसे में वे निर्दोष आम स्त्रियों की भीड़ में से अचानक पकड़ी जाती हैं और दंडोद्यत सामाजिक हिस्टीरिया का कारण बनती हैं।

होली, होलिका नामक स्त्री के गुप्त दुष्कृत्यों के अनावृत्त हो जाने पर पितृसत्ता का उन्मादी नृत्य है। चुड़ैलवत् स्त्रियों के दंड का विराट सांस्कृतिक जश्न भीड़ की आम स्त्री के लिए चेतावनी और ‘कोडेड’ संदेश है- स्त्रियों को अपनी चौहद्दी को ख़ुद कड़ा करने, यह नज़र रखने कि कोई साधारण दिखने वाली औरत भी चुड़ैल हो सकती है और खुद को चुड़ैलपन के दोष से मुक्त रखने की ज़िम्मेदारी लेने का संदेश।

दुनिया की तमाम सभ्यताओं में विच, चुड़ैल, डायन पाई जाती हैं। समाजों को चुड़ैलों के गुप्त घातों से मुक्त रखने के लिए मुस्तैद समाजों ने ‘विच हंटिंग’ के उपाय, प्रकरण और इतिहास पाये जाते हैं। इतिहास-पुराण ज्ञाता पीछे की बात बताएँगे पर भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की पहली चुड़ैल होलिका और पहला चुड़ैल-शिकार होलिका दहन ठहरता है। एक औरत को दंड की कथा के बरक़्स राक्षस रावण के वध की कथा लेकर संतुलन की कोशिश कीजिएगा तो बात निकलेगी और दूर तलक जाएगी। फ़िलहाल तो इतना ही कि समझा जाये कि ख़ुशनुमा लगने वाली परंपराओं और उत्सवों की जड़ में बोये गए स्त्री द्वेषी साज़िश को समझे बिना ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ की क़ैद में नाचती नायिका की नियति को न समझा जा सकता है न ही उससे टकराया जा सकता है। 

होली में होली से कीचड़ की होली खेलने वाली आपकी ग़ुस्ताख़ चुड़ैल! 

बुरा…मानो होली है! 

One thought on “होलिका- पितृसत्ता का उन्मादी नृत्य – नीलिमा चौहान

  1. Rahul Kumar says:

    विचारोत्तेजक लेख

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *