{"product_id":"atirikt-shunya-अतिरिक्त-शून्य-by-amit-upmanyu","title":"Atirikt Shunya | अतिरिक्त शून्य By Amit Upmanyu","description":"\u003cp\u003eहमारे समय की निर्मम और नंगी सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिये अमित उपमन्यु की कविता अलग-अलग कई रास्तों की तलाश करती है। उसके लिये जीवन को जानना एक अंतहीन और सतत\u003cbr\u003eप्रक्रिया है। उसके लिये यह दौर समय के माथे का एक ऐसा फोड़ा है, जिससे लगातार मवाद रिस रही है। वर्तमान एक नरक है, जिसमें रोम-रोम दु:ख रहा है। अमित की कविता मुखर वाग्मिता से परहेज नहीं करती लेकिन इसके साथ ही वह पौराणिक आख्यानों के संदर्भों और स्मृतियों के पास जाकर अपने समय का एक नया पाठ भी तैयार करती है। यह ऐसा पाठ है, जिसमें मिथकों और आज की वास्तविकताओं से एक नये अर्थ की सृष्टि होती है।\u003cbr\u003eअमित उपमन्यु की कविता में बाहर और भीतर के बीच एक निरन्तर\u003cbr\u003eचलती आवाजाही है। एक रिश्ता है, मन के भीतर और बाहर का। एक ब्रह्माण्ड है, जिसमें जो पृथ्वी है उसमें एक घर है, जिसमें वह रहता है लेकिन इस मन के भीतर एक और मन है, जिसमें वह अपना घर बना रहा है। इस घर के भीतर एक ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्ड में एक और पृथ्वी है, जिस पृथ्वी पर वह बेघर भटक रहा है। अमित की इन कविताओं में बाहर और भीतर के बीच द्वन्द्व भी है और निरन्तर आवाजाही भी ।\u003cbr\u003eराजेश जोशी\u003c\/p\u003e","brand":"Yuvaan Books","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":56055880319268,"sku":"9788169235167","price":159.2,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0997\/1679\/2612\/files\/9788169235167.jpg?v=1787556870","url":"https:\/\/unboundscript.com\/products\/atirikt-shunya-%e0%a4%85%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af-by-amit-upmanyu","provider":"Unbound Script","version":"1.0","type":"link"}