{"product_id":"hinsa-ahinsa-aur-bhagat-singh-jaati-janaganana-naye-sawal-aur-markswad-combo-of-3-books","title":"Hinsa Ahinsa Aur Bhagat Singh + Jaati Janaganana + Naye Sawal Aur Markswad – Combo of 3 Books","description":"\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eHinsa Ahinsa Aur Bhagat Singh - \u003c\/strong\u003eयह किताब भगत सिंह की श्रद्धाभाव से लिखी गई कोई पारंपरिक जीवनी नहीं है। भगत सिंह के प्रति इसकी जिम्मेदारियाँ इससे कहीं ज़्यादा गहरी हैं। यह उनके आस-पास बिखरी कहानियों, खबरों, तथ्यों और इतिहास के रूप में स्थापित छवियों को पुनर्विचार के लिए नए सिरे से दरियाफ़्त करती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइसके बीच से भगत सिंह का जो किरदार उभरता है, उसमें वे नायक तो बनते हैं, लेकिन गांधी खलनायक के रूप में नहीं दिखते। यह पुस्तक स्वाधीनता आंदोलन को 'बाइनरीज़' के स्थापित ढाँचे से बाहर निकालकर एक मुकम्मल शक्ल में देखना चाहती है—ताकि हमारे भारतीय गणराज्य को संपूर्णता में समझा जा सके। इसका उद्देश्य इतिहास को इतिहास सुनाना नहीं है, बल्कि वर्तमान को इतिहास बताना है, जिससे भविष्य के रास्ते तय होते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eJaati Janaganana - \u003c\/strong\u003eजाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है। किताब का बड़ा हिस्सा आधुनिक भारत में जाति जनगणना के इर्द-गिर्द खड़े आंदोलनों और विचारधाराओं पर केंद्रित है। फुले-शाहू-आंबेडकर, अय्यंकाली, नारायण गुरु, त्रिवेणी संघ, अर्जक संघ, समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आयोगों, मंडल आयोग और मंडल आंदोलन से होते हुए कांशीराम के बहुजन विचार तक। यह किताब दिखाती है कि जाति जनगणना कैसे ‘जात से जमात बनाने’ का बुनियादी ज़रिया है। जाति जनगणना ने बहुजन गोलबंदी, राजनीतिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनी। शैली के स्तर पर यह किताब आम पाठकों के लिए लिखी गई है, मगर इसके भीतर मौजूद सवाल पूरी तरह अकादमिक हैं। ये किताब उन तमाम सवालों का जवाब देती है, जिनको लेकर या तो भ्रम की स्थितियाँ हैं या अज्ञानता की। इस किताब सबसे बड़ी खासियत है— जटिल सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक भाषा में प्रस्तुत करना। जाति जनगणना दरअसल जाति की राजनीति, सामाजिक न्याय के वैचारिक संघर्ष और भारतीय लोकतंत्र की अधूरी परियोजना पर एक गंभीर, मगर पठनीय हस्तक्षेप है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eNaye Sawal Aur Markswad - \u003c\/strong\u003eअकारण ही मार्क्सवाद को एक पुरानी और स्थिर अवधारणा मान लिया गया है। इक्कीसवीं सदी में दुनिया के अनेक हिस्सों में इसपर पुनर्विचार करने की शुरुआत हुई है। यह पुस्तक स्त्रीवाद, लोकतंत्र, पर्यावरण, डेटा और इंटरनेट क्रांति, दलित और अन्य अस्तित्वमूलक प्रश्नों पर मार्क्सवादी नज़रिये से विचार करने की प्रेरणा देती है। इसके लिये यह विभिन्न नई किताबों और शोध - दृष्टियों का विश्वसनीय संदर्भ देती चलती है। यह किताब इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि यह मार्क्सवाद के इतिहास और मार्क्स के जीवन का भी पुनरावलोकन करती है। इसकी विषयवस्तु इसे मार्क्सवाद के शोधार्थियों, जनांदोलनों, मार्क्सवाद की आलोचना करने और उससे सायास दूरी बनाए रखने वाले पाठकों के लिये समान रूप से पठनीय और उपयोगी बनाती है।\u003c\/p\u003e","brand":"Combo_Set","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":67796823572772,"sku":"Diwali_Combo_3","price":524.4,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0997\/1679\/2612\/files\/UntitledDesign_8.png?v=1792407548","url":"https:\/\/unboundscript.com\/products\/hinsa-ahinsa-aur-bhagat-singh-jaati-janaganana-naye-sawal-aur-markswad-combo-of-3-books","provider":"Unbound Script","version":"1.0","type":"link"}