Divik Ramesh

Divik Ramesh

यह मेरी नई कहानियों का नवीनतम संग्रह है। मुझे यह कहना ज़रूरी लग रहा है कि ये कहानियाँ खुद मेरे लिए अनूठी हैं। मेरी पहले की कहानियों से काफी अलग और हटकर। सच तो यह है कि ये मेरी पिछली कहानियों का अगला कदम है। नयापन कहने के ढंग में भी है। आपको वे पात्त्र भी बतियाते नजर आएँगे जिन्हें पहले बतियाते नहीं देखा होगा। ऐसे पालों की हरकतें भी बड़ी मज़ेदार लगेंगी। जैसे हवा ने चाँटा मारा। कहानियों में बहुत मज़ेदार संवाद और नाटकीयता न जाने कैसे आते चले गए और लिखे जाने के बाद मुझे भी चौंका दिया। लेकिन ऐसे अंदाज़ में कि अलग दुनिया के न लगें, हमारे बीच के ही लगें। एक कहानी ऐसी भी है जिसमें एक बच्चा अपनी शारीरिक कमी पर बहुत सुखद विजय पाता है।यह कहानी है - भाड़ में जाए। और भई 'होलू' की तो बात ही मत पूछो। उसकी शरारत, उसका नटखटपन, उसकी सूझबूझ कहाँ से आई इसका तो मुझे भी नहीं पता। सच्ची इसका लेखक होकर भी। मुझे तो कहानी का शीर्षक रखना पड़ा - होलू का दिमाग़ चलता है। बस अब और अधिक नहीं बताऊँगा। आप सबको पढ़नी भी तो है ये कहानियाँ। तो शुरु हो जाओ। मैं अपने पाठकों का सदा आभारी रहता हूँ। आभारी तो उनका भी उतना ही होता हूँ जो मेरी रचनाओं को आप तक पहुँचाते हैं। सुंदर-सुंदर ढंग से। अनबाउंड स्क्रिप्ट का आभार