Dr Vikas kapoor

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गजानन माधव मुक्तिबोध भारत के एक ऐसे अनूठे साहित्यकार हुए हैं जिनकी रचनाएं शिल्प और रूप के नए प्रतिमान स्थापित करती हैं। इस अमर साहित्यकार के लेखन को आज की पीढ़ी से परिचित करवाने के मंतव्य से उनकी एक कहानी पर आधारित नाटक किशोर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। मूल कहानी में पक्षी और दीमक के माध्यम से जो कहा गया है, उसे पाठकों के लिए रुचिकर और ग्राह्य बनाने के लिए नाट्यालेख में एक किशोर लड़के की कहानी को समानांतर पिरोया गया है। आशा है यह नाटक इस ओर ध्यान आकर्षित करने में भी सफल होगा कि मुक्तिबोध द्वारा दशकों पूर्व सृजित मूल कहानी में मौजूदा समाज की वृत्तियों का कितना सटीक वर्णन झलकता है।

'पक्षी और दीमक' एक ऐसे पक्षी की कहानी है, जिसमें एक गाड़ी वाला दीमक के बदले पक्षी के पंख मांग लेता है। दीमक का शौक उसे प्रेरित करता है कि वह पक्षी स्वेच्छा से अपना पंख निकाल कर उस गाड़ी वाले को दे और बदले में दो दीमकें प्राप्त कर ले। कालांतर में उस पक्षी को दीमक की लत लग जाती है और वह दीमक रूपी बेकार वस्तु के बदले अपने सपने और सृजनशीलता रूपी पंख दे कर क्रमशः कमज़ोर होता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब उसके पिता उसे समझाते हैं कि 'बेटे, दीमकें हमारा स्वाभाविक आहार नहीं हैं और उसके लिए अपने पंख तो हरगिज़ नहीं दिए जा सकते' लेकिन वह नहीं मानता और अपने सभी पंख गंवा बैठता है। कुछ ऐसा ही आज हमारे आस पास हो रहा है जब
मौजूदा पीढ़ी की संघर्ष-क्षमता को नशे का आदी बनाकर नष्ट किया जा रहा है। यह नशे भांति भांति के हैं। यानी आज 'दीमक' की मौजूदगी कई रूपों में सहज रूप से दिखाई पड़ जाती है, हर रोज़ कभी नाना प्रकार के मोबाइल गेम के रूप में, तो कभी मादक पदार्थों के रूप में और कभी इंटरनेट पर पसरे नीले ज़हर के रूप में। मेरे विचार में अंधश्रद्धा और अंधविश्वास भी दीमक समान हैं। हमें आने वाली पीढ़ी को हर हाल में इस जंजाल से बचाना होगा।

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