महापंडित राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963) हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार, इतिहासविद्, चिंतक, यात्राकार तथा प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे। उन्हें हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अरबी, अंग्रेज़ी, फ़ारसी, पालि, तमिल, कन्नड़, रूसी, फ़्रांसीसी, जापानी, तिब्बती सहित लगभग 36 भाषाओं का ज्ञान था। अनेक भाषाओं के ज्ञाता होने के बावजूद उनका विशेष अनुराग हिंदी भाषा से था।
राहुल सांकृत्यायन ने 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में यात्रा साहित्य और विश्व-दर्शन के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। इसी कारण उन्हें "हिंदी यात्रा साहित्य का पितामह" कहा जाता है। बौद्ध धर्म पर उनका गहन शोध हिंदी साहित्य में युगांतरकारी माना जाता है। इसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक व्यापक यात्राएँ कीं तथा मध्य एशिया और कॉकेशस क्षेत्रों की यात्राओं पर भी महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत लिखे।
बौद्ध धर्म के गहन अध्ययन और अपने व्यापक भ्रमण के दौरान वे उससे अत्यंत प्रभावित हुए। मूलतः उनका नाम केदारनाथ पांडेय था। बाद में उन्होंने अपना नाम बदलकर राहुल सांकृत्यायन रख लिया। वर्ष 1930 में श्रीलंका में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करने के बाद वे 'रामोदर साधु' से 'राहुल' कहलाए तथा अपने सांकृत्य गोत्र के कारण 'सांकृत्यायन' नाम अपनाया।
राहुल जी के जीवन का मूल मंत्र घुमक्कड़ी अर्थात् निरंतर गतिशीलता था। उनके लिए घुमक्कड़ी केवल एक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक धर्म थी। आधुनिक हिंदी साहित्य में वे एक यात्राकार, इतिहासविद्, तत्वान्वेषी और युग-परिवर्तनकारी साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
वर्ष 1961 में उनकी स्मृति कमजोर होने लगी और अंततः 14 अप्रैल 1963 को उनका निधन हो गया। उसी वर्ष भारत सरकार ने उनके अद्वितीय साहित्यिक एवं बौद्धिक योगदान के सम्मान में उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया।
राहुल सांकृत्यायन का व्यक्तित्व भारतीय ज्ञान-परंपरा, जिज्ञासा, अन्वेषण और मानवतावादी दृष्टि का अद्वितीय उदाहरण है। उनकी रचनाएँ आज भी पाठकों को ज्ञान, साहस और नए अनुभवों की खोज के लिए प्रेरित करती हैं।