लड़का भात बनाना भी नहीं जानता' के उलाहने से लेकर सुंदर, सुरुचिपूर्ण ‘बैचलर्स किचन' तक की यात्रा सिर्फ़ पकाने - खाने तक की यात्रा नहीं है। विनीत की यह किताब एक भावनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ है जहाँ चप्पे-चप्पे पर माँ और पीछे छूट चुके घर की यादें हैं । यह सिंगल्स के खाने-पकाने को एक ठोस सैद्धांतिक ज़िद के साथ आकार देने की कहानी है। 'अकेले का क्या है, कुछ भी खाकर सो जाएगा', यह किताब इस आमफ़हम ख़याल को झकझोरती है और अपने आप से कुछ सवाल पूछने को कहती है। अकेले रहते हुए भी अपने खाने को स्वादिष्ट और उसकी प्रस्तुति को क्यों सुंदर नहीं बनाया जाना चाहिए? अपने खाने के लिए भी नए प्रयोग करने और पारंपरिक खाने को याद करने से क्यों शर्माना चाहिए? इस किताब के पास अपना तर्क है, अपना आस्वाद और अपना सौंदर्यबोध !