ग़ज़ा की उदास अकेली बालिका सरीखी, भोली भाली छोटी सी पुस्तिका से, संवेदनशील सुधि पाठकों व प्रबुद्ध सह-नागरिकों का भावनात्मक जुड़ाव देख बहुत अच्छा लगा |संभावनाओं का सीमान्ती- या सामन्तीकरण नहीं हुआ है।शिक्षा और खोज का मनुष्य व सृष्टि में नैसर्गिक प्रवाह कोई रोक नहीं सकता भले ही मानवीय लोभ और कुटिलता के कई कच्चे पहाड़ टूट कर इस पर गिर पड़ते हों |सत्ता के दायरों में पनपती कुंठा और विकृति की तलछट नौकरी तो छीन सकती है पर केन प्रश्नों पर प्रतिबन्ध लगाकर क्या उपनिषदों को नकार पायेगी? समय का कोई भी दौर इतना प्रबल नहीं "..कि सवाल पैदा करने वाली जगहों को ही कमज़ोर" (पृ.सं.९) कर तोड़ दे|पुस्तक का अपना प्रकरण है जो कि स्व-अनुभव से ज़्यादा सार्वजनिक होता जा रहा है| यह एक लोक सन्दर्भ है और उसी में उसकी अर्थपूर्ण सार्थकता है; और प्रमाणिकता भी | क्योंकि कभी भी, कहीं भी, मानवीय व्यवहार के समष्टिगत प्रतिरूपों का निर्माण समकालीन और ऐतिहासिक सन्दर्भों से ही निर्मित होता है जिसमें चेष्टाओं और क्रियाओं से जुड़े या वांछित प्रभाव, सामाजिक प्रक्रियाओं और अवस्था का निर्माण करते हैं. कारण और प्रभाव से बढ़ कर सन्दर्भ और उनकी प्रबलता वास्तविकता और भविष्य दर्शन का निर्माण और उसे अभिव्यक्त करते हैं. अभी बहुत कुछ बाक़ी है जो कि अभिव्यक्त और प्रगट नहीं हुआ | और जो हुआ और हो रहा है उसमें शक्ति है उस नए प्रकल्प को आगे बढ़ाने की जिस खातिर लेखक ने रोहित विमूला को पत्र में लिखा: " (तुम्हें) लड़ना था साथी, माना कि लड़ना कतई आसान न था | माना कि जाते हुए भी हज़ारों वर्षों के संघर्ष को एक तीखी नोक में बदल दिया तुमने |" (प्र. सं. ९७).यह भी लिख देते कि समय टेलीस्कोपिक हो गया है| जो पहले हज़ारों साल में हुआ वह अब हज़ार घंटों में भी हो जाना संभव है| आशा और शिक्षा ही निर्माण करते हैं भविष्योन्मुख चेतना का जो समष्टिगत जनून और बदलाव के वाहक बनते हैं (Ernst Bloch: The Principle of Hope).लेखक के कहे वाक़्यात को बैनुलाकुवामी और कौमी नज़रिये से देखा जाए तो साफ़ नज़र आता है कि Rightist सियासत अक्सर कुछ ऐसे नज़रियों से गरम रहती हैं जिसमें:१. अवाम को इंसानी मक़बूलियत हासिल नहीं; उन्हें नंबर भी नहीं; सिर्फ सियासी, money और फौजी ताक़त का ग़ुलाम समझा जाता है;२. इस सियासत का कोई इंसानी-रूहानी -दुनियावी नज़रिया लेकर कोई मुस्तक़बिल नहीं होता; कोई फ्यूचर प्रोजेक्ट नहीं होता, बस रोज़-बरोज़ हंगामा ही होता है; किस्म किस्म की मारपीट और हिंसा होती रहती है स्टेट फार्मेशन भी नहीं; और३. यह सियासत होती तो है धूर्त, चालाक और बहुत हीi खुदगर्ज़ लोगों की; पर वे छुपे होते हैं. सामने की पॉलिटिक्स में उनके वे पैदल सिपाही होते हैं जो अक्सर हीनता के अहंकार से लबालब, मदमस्त और छलकते अंध-आत्मविश्वास में कुछ भी कर गुजरने का जनून रखते हैं.ऐसी सत्ताएं नहीं चाहतीं कि समाज में मन, बुद्धि, जिज्ञासा व चैतन्य विकास हो |जब एक कालखंड में राजनीति और राज्य सत्ता के पास कोई भविष्योन्मुख आख्यान न हो जैसा कि दिख रहा है; ज़रा देखो चारों ओर- "ग्रेट" ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, कनाडा, तुर्किये, जर्मनी या इजराइल... , ...., ...., ...., ...., . . . . . . .यूरोपीय यूनियन, 5-11आंखें , और ऐसे सब कुलीनतंत्री औलीगारकिक शासन व्यवस्थाऐं; और फिर दक्षिण एशिया में अधिकांशतः जम्हूरियत को जमूरा बनाती; भावना शून्य, विवेकशून्य, चित-वृत्ति और विचारधारा विहीन; बस राज करने के जूनून और ललक पर सवार सरकारों के पास कोई भविष्य दर्शन और आख्यान नहीं. तो ऐसे में क्या होता है? दिखता है कि बस कुछ नहीं.प्रोफेसर की डायरी से पता चलता है कि स्टेट अनुत्तीर्ण हुआ अकादमिक कसौटी पर भी.भारत की ८० प्रतिशत जनता ऐसे वर्ग में आ गयी जिसके पास इतने पैसे और व्यवहारिक समानता नहीं जिसके चलते वह स्टेट के वर्तमान आर्थिक तंत्र और नीतियों पर आधारित शिक्षा जैसे नैसर्गिक और संविधानिक अधिकार को प्राप्त कर सके. क्योंकि आरक्षण के विरुद्ध "मेरिट" का दम ठोकने वालों को, शिक्षा के आरक्षित क्षेत्र से आने वाली "मेरिट" फूटी आंख नहीं सुहाती. तो कमी कहाँ कहाँ है?लेखक का कहना है: कमी है शिक्षा को विकसित मानव-समष्टि के नैसर्गिक अधिकारों से अलग कर उसे राज्य द्वारा वस्तु बना कर विशिष्ट वर्ग के हित में पूँजी जमाखोरों के हाथों में बेच देना. कमी है पिछड़ी जाति और लोकतंत्र द्वारा मान्य राजनीतिक प्रतिद्वंदिता को सत्ता में और समाज में हमारे ही द्वारा दी गयी शक्तियों से संपन्न वर्ग द्वारा हमारा ही शोषण और अन्याय जिसके कारण यूनिवर्सिटी का स्तर गिरता जा रहा है, देश के बच्चों का शैक्षणिक स्तर कमज़ोर होता जा रहा है, और समाज पीछे जा रहा है. " एक आम अनपढ़ इंसान भी पेट काट कर , ज़रुरत पड़ी तो खेत-खलिहान, जगह-ज़मीन, गहने-गुरिया गिरवी रख कर भी अपने घर के बच्चे को पढ़ने लिखने भेजता रहा | धीरे धीरे रोज़गार और तालीम का रिश्ता टूटने लगा| शिक्षा का चरित्र समाजवादी से पूंजीवादी होता चला गया|" (पृ. सं. ४५).और सब से बड़ी बात कि लेखक, उनंके विद्यार्थी, उनके कॉलेज और समाज के साथ अन्याय हुआ है क्योंकि लेखक के पास पूर्ण योग्यता है कि वे प्रोफेसर के पद पर पक्के हों पर उन्हें एड-हॉक पोजीशन से भी १४ साल की मेरिटोरियस सेवा के बाद नौकरी से निकाल दिया गया; उनकी शैक्षणिक योग्यता का उनके इंटरव्यू में मखौल उड़ाया गया; और बड़ी से भी बड़ी बात- इस बात का पता है उन सब विद्यार्थियों को जो उनकी इज़्ज़त करते है; और उस समाज को भी जिन्हें अपने धर्मों में गुरुओं की इज़्ज़त करनी सिखाई जाती रही है. वे भी "गुरु" हैं जो की दूसरी तरफ बैठे थे. कैसे "गुरु", या "पूजनीय गुरु जी" के क्लोन!!पर क्या यह संभव है हर उस के लिए जिसे शिक्षा न मिल पायी - सिर्फ ग़रीबी के चलते; या ग़रीबी और जाति आधारित सामाजिक अन्याय के कॉम्बो के चलते; या इस लिए कि क्रूर ब्राह्मण पेशवाओं के चलते उन्हें पीछे झाड़ू आगे मटकी लगा कर नर-पशु बन जीना पड़ा था; और जब उन्होंने बदला लिया 1818 ...