'जीते जी मैं हो गया हूँ/अपना ही पूर्वज'- यह और ऐसी ही अनेक मार्मिक पंक्तियों से भरा हुआ यह संग्रह एक कवि की पहली कृति है। परन्तु इस लेखन में भी एक विलक्षण प्रौढ़ता है, जो पाठकों का ध्यान ज़रूर आकृष्ट करेगी। सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि समकालीन कविता के सुपरिचित मुहावरे को अपने ढंग से बरतता हुआ यह कवि उसके भीतर से अपने लिए नयी सरणियाँ निकालना चाहता है। यह रचनात्मक कोशिश इस संग्रह को ख़ासतौर से उल्लेखनीय बनाती है। कथन की नयी भंगिमाओं के साथ-साथ यहाँ विषय चयन में भी एक सुखद विविधता देखी जा सकती है, जिसका विस्तार 'पानी गिरने की आवाज़' से कालाहांडी के उस अकाल तक फैला हुआ है, जिसके बचे हुए जल में भी सूखे का प्रतिबिम्ब है। यह कविता का सिर्फ़ भौगोलिक विस्तार नहीं है, बल्कि एक विकासमान कवि के आंतरिक भूगोल का भी सूचक है।
'बारिश के पिंजड़े में' चंदनसिंह की, समकालीन कविता के दरवाज़े पर दी जानेवाली यह पहली दस्तक दूर तक सुनी जायेगी-क्योंकि यहाँ एक भरोसा है और उस भरोसे में हमारे समय की छिपी हुई 'आयरनी' भी- क्षमा करें
किसी के हृदय-रोग के बारे में सुनकर
दुःख मुझे अधिक नहीं होता
पृथ्वी पर हृदय के बचे रहने का भरोसा होता है।
-केदारनाथ सिंह