Bhaktiyog | भक्तियोग

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Bhaktiyog | भक्तियोग

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वेदान्त का सबसे उदात्त तत्त्व यह है कि हम एक ही लक्ष्य पर भिन्न-भिन्न मार्गों से पहुँच सकते हैं। स्वामी जी ने इन्हें साधारण रूप से चार मार्गों में विभाजित किया है- कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । परन्तु वे इन्हें बिल्कुल पृथक्-पृथक् विभाग नहीं मानते। वे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं कि तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिले, जिसमें कर्म करने के अतिरिक्त दूसरी कोई शक्ति न हो, अथवा जिसमें केवल भक्ति या केवल ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ न हो। ये विभाग उन्होंने केवल मनुष्य की प्रधान प्रवृत्ति अथवा गुण प्राधान्य के अनुसार किये हैं। ये सब मार्ग एक ही लक्ष्य में जाकर एक हो जाते हैं।
इसका एक मार्ग है भक्ति। लेकिन भक्ति क्या है? इस पुस्तक में स्वामीजी इसी बारे में बात करते हैं। मानव हृदय की सबसे कोमल और शक्तिशाली भावना है-प्रेम । जब इस सांसारिक और स्वार्थी प्रेम को ऊँचा उठाकर उस परम, सर्वव्यापी ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम में बदला जाता है तो वह सर्वकल्याणकारी भक्ति में बदल जाती है।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Edition 1ST
ISBN 9788169235358
Year 2026
Format Paperback
Pages 72
Language Hindi

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