वेदान्त का सबसे उदात्त तत्त्व यह है कि हम एक ही लक्ष्य पर भिन्न-भिन्न मार्गों से पहुँच सकते हैं। स्वामी जी ने इन्हें साधारण रूप से चार मार्गों में विभाजित किया है- कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । परन्तु वे इन्हें बिल्कुल पृथक्-पृथक् विभाग नहीं मानते। वे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं कि तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिले, जिसमें कर्म करने के अतिरिक्त दूसरी कोई शक्ति न हो, अथवा जिसमें केवल भक्ति या केवल ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ न हो। ये विभाग उन्होंने केवल मनुष्य की प्रधान प्रवृत्ति अथवा गुण प्राधान्य के अनुसार किये हैं। ये सब मार्ग एक ही लक्ष्य में जाकर एक हो जाते हैं।
इसी तरह कुछ लोग ज्ञानमार्ग पसंद करते हैं। ऐसे लोग जीवन के परम सत्यों को केवल आस्था से नहीं, बल्कि तर्क, विवेक और बौद्धिक गहराई से समझना चाहते हैं। स्वामीजी की यह पुस्तक इस मार्ग का दरवाज़ा है। यह सारे भ्रमों को दूर कर निर्भीक, स्वतंत्र और आत्मविश्वासी बनाती है।
"स्वयं को कमज़ोर मानना ही सबसे बड़ा पाप है। तुम अमर आत्मा हो, न बंधे हो और न कभी बंध सकते हो।"