बेरोज़गार इंजिनियर और गूंगी गन का इंसाफ़ | लेखक: विश्वास शर्मा दिल्ली की उमस भरी अगस्त–सितंबर की रातें, झिर-झिर बरसात और गलियों की घुटन… इन्हीं के बीच चलती है यह कहानी— एक बेरोज़गार इंजीनियर, एक क़ातिल और एक पुलिसवाले की। बाबू दिलवाला जेल से सिर्फ़ तीन घंटे के लिए बाहर आया—मनचंदा का क़त्ल करने। लेकिन वह कभी लौट नहीं सका। किसने मारा उसे? उसकी प्रेमिका बेबी ने, मनचंदा ने, या हमेशा इंसाफ़ करने वाली गूँगी गन ने? पाठक को रहस्य का आधा सिरा पहले मिल जाता है, मगर किरदार अपनी ही तलाश में उलझे रहते हैं। सचाई की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और हर पन्ना दिल्ली के मौसम, बरसाती अँधेरे और बेचैन कर देने वाले माहौल से सराबोर है। यह उपन्यास केवल अपराधकथा नहीं है—यह अपने दृश्यात्मक और घटनात्मक प्रभाव से किसी फ़िल्म की तरह अनुभव कराता है।