हमारे समय की निर्मम और नंगी सच्चाइयों को व्यक्त करने के लिये अमित उपमन्यु की कविता अलग-अलग कई रास्तों की तलाश करती है। उसके लिये जीवन को जानना एक अंतहीन और सतत
प्रक्रिया है। उसके लिये यह दौर समय के माथे का एक ऐसा फोड़ा है, जिससे लगातार मवाद रिस रही है। वर्तमान एक नरक है, जिसमें रोम-रोम दु:ख रहा है। अमित की कविता मुखर वाग्मिता से परहेज नहीं करती लेकिन इसके साथ ही वह पौराणिक आख्यानों के संदर्भों और स्मृतियों के पास जाकर अपने समय का एक नया पाठ भी तैयार करती है। यह ऐसा पाठ है, जिसमें मिथकों और आज की वास्तविकताओं से एक नये अर्थ की सृष्टि होती है।
अमित उपमन्यु की कविता में बाहर और भीतर के बीच एक निरन्तर
चलती आवाजाही है। एक रिश्ता है, मन के भीतर और बाहर का। एक ब्रह्माण्ड है, जिसमें जो पृथ्वी है उसमें एक घर है, जिसमें वह रहता है लेकिन इस मन के भीतर एक और मन है, जिसमें वह अपना घर बना रहा है। इस घर के भीतर एक ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्ड में एक और पृथ्वी है, जिस पृथ्वी पर वह बेघर भटक रहा है। अमित की इन कविताओं में बाहर और भीतर के बीच द्वन्द्व भी है और निरन्तर आवाजाही भी ।
राजेश जोशी