ग़ालिब पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन ग़ालिब के सौ शेरों के साथ बैठकर उनके भीतर खुलते अर्थों की सौ अलग दिशाओं को देखना एक अलग तरह का काम है। मिर्ज़ा ग़ालिब के सौ रंग इसी पाठकीय और आलोचनात्मक अनुभव से बनी पुस्तक है। इसमें ग़ालिब के सौ चुनिंदा शेर हैं-ऐसे शेर, जिन्हें हममें से अधिकांश पहले से जानते हैं, सुनते आए हैं, उद्धृत करते रहे हैं; लेकिन जिन्हें ध्यान से पढ़ने पर भाषा, अनुभव और अर्थ की नई परतें खुलती हैं। ग़ालिब की महानता केवल उनकी जटिलता में नहीं, बल्कि इस क्षमता में है कि उनका सबसे सहज शेर भी पाठक को अपने भीतर कहीं गहरे ले जा सकता है।
प्रेम, अकेलापन, मृत्यु, ईश्वर, आत्मसम्मान, इच्छा, असफलता और जीवन की विडंबनाएँ - इन सबके बीच ग़ालिब का काव्य-मन लगातार अपने आप से संवाद करता है। यही कारण है कि उनका शेर अपने समय से निकलकर हर नए समय में फिर से अर्थवान होता है। यह पुस्तक ग़ालिब के शेरों के अंतिम अर्थ सुनाने की कोशिश नहीं करती। वह उनके साथ कुछ देर ठहरती है-शब्दों को देखती है, वाक्य की बनावट को सुनती है, चुप्पियों को पढ़ती है और पूछती है कि एक शेर आख़िर हमारे भीतर इतना दूर तक क्यों चला जाता है। ग़ालिब को जानना शायद उनके शेर याद कर लेना नहीं है। उन्हें पढ़ना तब शुरू होता है, जब याद किया हुआ शेर अचानक हमारे अपने जीवन के बारे में कुछ कहने लगे।