Baramde - कहीं स्कूटी की चाबी होने वाली है गुम, तो कहीं अंकल चिप्स के लिए किया जाएगा जुर्म ।
कहीं प्यार से परीक्षा टकराएगी, तो कहीं आम खाते-खाते शर्ट पीली हो जाएंगी।
कैसा लगता है जब सुनने ना मिले “आई लव यू टू”, और क्या चुना जाए जब विकल्प हो केवल जंगल या ज़ू ?
आइए लौटते हैं उन बरामदों में जो हमारे कई किस्से और कांड का हिस्सा बन जाते थे
मिहिर की ये कहानियाँ भारतीय कस्बाई मध्यवर्ग का सुंदर और मार्मिक रेखाचित्त्र खींचती हैं और क़िस्सागोई इतनी अनूठी है कि इस किताब को बार-बार पढ़ने का मन करता है।
Gamchha - ममता कालिया की अनुभवी कलम से निकली ये तेरह नई कहानियाँ समाज और मन की ऐसी छुपी हुई जगहों का आख्यान हैं जिनपर सामान्यतः नज़र नहीं जाती । इन्हें रचते हुए वे अलग- अलग शैलियों, चरित्रों और स्थितियों का बड़े ही सिद्धहस्त तरीके से संधान करती हैं। पढ़ते हुए आप यह महसूस करते हैं कि ये कहानियाँ सहज-पठनीय हैं, अपनी बुनावट में सरल प्रतीत होती हैं लेकिन अपने कथ्य और विषयवस्तु के चयन में, जटिल और बहुस्तरीय हैं। इनकी सूक्ष्मता ज़ाहिर नहीं है, वह पाठक की चेतना में घटित होती है । पारिवारिक सामाजिक ताने-बाने में कुचली जाती स्त्री हो या बदलाव की ऊर्जा से भरे किन्तु दिशाहीन युवा, साहित्यिक आयोजनों का छिछलापन हो या एकाकी पिता का बुढ़ापा; इन कहानियों में ऐसे सभी पात्र, समुदाय और घटनाएँ अपनी मार्मिकता, विडम्बना और हास्यबोध को ऐसे ही साथ लिए चलते हैं जैसे वे हमारी इस दुनिया में मौजूद हैं ।
Muhar - रोली घमंडी है, रोली अकडू है, रोली ज़िद्दी है... ऐसी तमाम तोहमतों के बीच रोली है कि नौकरी पाने, नौकरी की जगह तक पहुँच पाने और वहाँ से घर लौटने की जद्दोजेहद से रोज़ गुज़र रही है। यक़ीन कीजिए कि ये साधारण सी दिखने वाली बातें एक वर्किंग वूमन के लिये रोज़ लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ हैं। जेंडर, आयु और शहरी/ग्रामीण पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर किये जाने वाले कई सूक्ष्म और स्थूल भेदभाव हैं जिनका सामना रोली और उस जैसी तमाम कामकाजी स्त्रियों को रोज़ करना होता है। परिवार, समाज और रोज़गार के मुश्किल कुरुक्षेत्र में जूझती रोली को केंद्र में रखकर लिखी गई ये कहानियाँ हर कामकाजी स्त्री के जीवन, स्वप्न और संघर्ष का सूक्ष्म और मार्मिक दस्तावेज़ बन पड़ी हैं।
Dibiya - उदय प्रकाश की छोटी कहानियों के इस चयन में भी उनके कथावैशिष्ट्य के सभी तत्व सहज गतिमान दिखते हैं। जादू, मार्मिक स्मृतियाँ, विडंबना बोध और व्यंग्य उनकी इन कहानियों में एक कौंध की तरह आते हैं और पाठक की चेतना को प्रकाशित कर जाते हैं। माँ, पिता, भाई और मित्रों से आत्मीय किंतु जटिल रिश्तों की कई परतें इन कहानियों की संवेदना भूमि को बनाती हैं। उदय प्रकाश के पास, स्मृतियों और बाहरी संसार के जादू भरे वर्णन की एक ऐसी अद्वितीय भाषा है जो उन्हें गल्प के माहिर कारीगरों के बीच रखती है। अवसरवाद से उपजी गुलाम मानसिकता और यांत्रिकता जहाँ मनुष्य को दयनीय बना रही है वहीं दूसरी ओर अकेला भी कर रही है ।यहाँ अपने में खोया हुआ बचपन भी उतना ही सच्चा है जितनी प्रमाणिक मृत्यु की आहटें हैं।
Paavati Kaun Dega - प्रिय का सधा हुआ चमकदार गद्य उनके व्यंग्य को वह ज़रूरी धार मुहैया कराता है जिसकी अनुपस्थिति में इस तरह के लेखन के सामने दोहराव का जोखिम बना रहता है। उनके लेखन में जीवन से सीधी मुठभेड़ करते आमजन के लिए स्पष्ट प्रतिबद्वता तो नज़र आती ही है, उनके अध्ययन के विस्तृत और दिलचस्प दायरे की झलक भी मिलती है। वे बड़ी आसानी से भाषा और शैलियों के अलग-अलग रास्तों में आवाजाही करना जानते हैं और उनकी चपल और संवेदनशील दृष्टि चीज़ों के आरपार देखने का हौसला रखती है। प्रिय का यह पहला संग्रह समकालीन साहित्य में उनकी मजबूत उपस्थिति को दर्ज करेगा। -अशोक पाण्डे प्रिय हिन्दी व्यंग्य की उम्मीद हैं। उनके लेखन में राजनीतिक जुमलों से भरमाने वाली अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उससे आगे निकलता सहज परिहास है। बीते अनेक दशकों से व्यंग्य के नाम पर बौद्विक कुण्ठा परोसी जा रही थी। कभी-कभी कुण्ठा के ऐसे ही प्रस्तुतिकरण को राजनीतिक चेतना भी कह दिया जाता रहा है। प्रिय की लिखत में सिर्फ राजनीति नहीं, हमारे आसपास का आम परिवेश है। प्रिय, तुम ‘पारसाई’ से बचते हुए