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Aadat Hai Humko | आदत है हमको By Gopal Datt

Rs. 224
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गोपाल दत्त प्रसिद्ध अभिनेता और गीतकार गोपाल दत्त का यह कविता संग्रह उनके रचनात्मक संसार का एक नया और अनदेखा पक्ष सामने लाता है। मंच और परदे पर दिखाई देने वाले उनके व्यक्तित्व से परे, यह किताब उन भावनाओं, विचारों और अनुभवों को सहेजती है, जो अक्सर अभिनय की रोशनी में छूट जाते हैं। इस संग्रह में शामिल है उनकी लोकप्रिय और चर्चित कविता ‘और करो थिएटर’, साथ ही बड़े शहर के शोऑफ और कला की इंसाफ़ पसंदगी को दर्ज करती उनकी थोड़ी ड्रामैटिक लेकिन बेहद चर्चित कविता ‘बड़े शहर का स्क्रीनप्ले’। इसके अलावा, इसमें उनके कई ऐसे गीत भी हैं, जिन्हें आप पहले सुन चुके होंगे या जिनकी गूँज आपको जानी-पहचानी लगेगी। आदत है हमको गोपाल दत्त के बहुरंगी रचनात्मक व्यक्तित्व की सच्ची झलक है—जहाँ कविता, गीत और जीवन एक-दूसरे में घुलते नज़र आते हैं। कविता प्रेमियों और रंगमंच से जुड़े पाठकों के लिए यह संग्रह विशेष रूप से पठनीय है।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Genre Literature, Romance, Poetry, and Literary Poetry
Edition 1st
ISBN 9789347125270
Year 2025
Format Hardcover
Pages 80
Language Hindi

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पढ़ने की आदत हैं हमको...

बहुत बेहतरीन किताब...... आदत हैं हमको शीर्षक उन छोटी-छोटी चीजों की ओर इशारा करता है जिनकी हमें आदत हो जाती है—चाहे वह कोई दुख हो, किसी का इंतजार हो, या फिर खुद से की गई बातें। यह शीर्षक इंसान की उस फितरत को दर्शाता है जिसमें वह हर परिस्थिति में ढल जाता है।​​वैसे तो यह किताब सभी को पसंद आनी चाहिये पर मुझे लगता यह किताब विशेष रूप से उन लोगों को बहुत पसंद आयेगी जो छोटे शहरों से बड़े सपनों के साथ बाहर निकले हैं। इसमें मध्यम वर्गीय जीवन की विडंबनाओं और खुशियों को बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है।

A
Ashutosh Joshi
दिलचस्प और गहराई से जुड़ी हुई एक आवाज़

ग़ोपाल दत्त का यह कविता-संग्रह जीवन के छोटे-बड़े अनुभवों पर बहुत ही सादगी और आत्मीयता से बात करता है। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई जाना-पहचाना चेहरा सामने बैठा अपने किस्से सुना रहा हो — बिना बनावट, बिना दिखावे के।नैनीताल की वादियों, पहाड़ी हवाओं और पुराने घरों की दीवारों की गंध बार-बार पंक्तियों में महसूस होती है। "घर" यहाँ केवल भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि स्मृतियों, अपनों और अपनी जड़ों से जुड़ने का प्रतीक बनकर आता है।संग्रह में ग़ोपाल दत्त की प्रसिद्ध रचना "और करो थिएटर" भी शामिल है, जो अपने व्यंग्य और आत्ममंथन से न केवल थिएटर जगत को बल्कि पूरे समाज को एक आईना दिखाती है। यह कविता अपने समय की कला-संस्कृति पर तंज करती है, पर साथ ही उसमें वह ताज़गी भी है जो दत्त की भाषा में स्वाभाविक रूप से आती है।भाषा यहाँ सरल है, पर भावनाएँ गहरी। चाहे स्मृतियों का संदर्भ हो या आत्म-चिंतन का क्षण, हर कविता पाठक को ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करती है।"

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