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Bawalistan | बवालिस्तान By Tasneem Khan

Rs. 224
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तसनीम ख़ान की ये कहानियाँ परिवार, समाज और राजनीति के अलग-अलग आयामों की गहरी पड़ताल और उनमें अंतर्निहित आख्यान को दर्ज करने की मुसलसल कोशिशों से उपजी हैं। कहानियों के परिवेश और भाषा में वर्णित संस्कृति को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है; अर्थात यह संसार कथाओं में बड़े विश्वसनीय ढंग से आया है। धर्म, स्त्री और पारिवारिक जीवन के जटिल अंतरसंबंधों को गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ कहती यह कहानियाँ अपने आप स्त्री के दुख और सांप्रदायिकता की बढ़ती विषबेल की पहचान करती चलती हैं। शीर्षक कहानी 'बावलिस्तान' मौजूदा भारतीय राजनीति और मीडिया के खोखले चरित्र को एक दिलचस्प स्थिति के सहारे नुमायाँ करती है तो वहीं ' अब्दुल की मौत' भी मौत के बाद की काल्पनिक परिस्थिति में सांप्रदायिकता की समस्या का परीक्षण करती है। कहानियों में गहरी रागात्मकता है, बोली का सुंदर रचाव है और स्पष्ट राजनैतिक समझ है ।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Genre Literature, Short Story Collection, Literary Fiction, Contemporary Fiction, and Social & Political Thought
Edition 1st
ISBN 9789347125805
Year 2026
Format Paperback
Pages 230
Language Hindi

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  • 5 stars: 9 (100%)
  • 4 stars: 0 (0%)
  • 3 stars: 0 (0%)
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J
Jhankaar
Highly recommend

बवालिस्तान…✍🏻जहाँ कहानियाँ सिर्फ लिखी नहीं जातीं, जी ली जाती हैं। इन 15 कहानियों में हर मोड़ पर एक सच्चाई आपका इंतज़ार करती है…✍🏻कहीं मज़हब और इंसानियत के बीच पसरी खामोश दरारों को बेनकाब करती है, तो कहीं राजनीति के खेल में उलझी इंसानियत ,टूटती हुई हिंदू-मुस्लिम एकता के बीच भी एक जिद्दी-सी उम्मीद जगा जाती है।✍🏻यहाँ परिवार सिर्फ रिश्ता नहीं एक संघर्ष है, समाज सिर्फ ढांचा नहीं, एक आईना है, और राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं बल्कि आम इंसान की सांसों में उतरती हुई सच्चाई है।✍🏻पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की ये बुनावट इतनी सजीव है कि कई बार शब्द धुंधले पड़ जाते हैं… और एहसास साफ़ दिखाई देने लगते हैं। ये किताब पढ़ी नहीं जाती धीरे-धीरे भीतर उतरकर जी ली जाती है…✍🏻‘बवालिस्तान’…एक किताब नहीं हमारे समय की धड़कन है। ⏳Jhankaar Anand

A
Ayushi Shukla
Bahut sundar kitab

लेखिका तस्नीम खान द्वारा रचित कहानी संग्रह 'बवालिस्तान' हिंदी साहित्य में एक चर्चित कृति है, जो युवान बुक्स से प्रकाशित है। यह पुस्तक अपनी तीखी सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियों और आम आदमी की पीड़ा को बयां करने के कारण चर्चा में है 🪷🌷कहानियों का एक संग्रह है, जो आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य के 'बवाल' यानी उथल-पुथल को दर्शाता है।🌷लेखिका ने धर्म, सांप्रदायिकता, राजनीति, और मीडिया के खोखले चरित्र को अपनी कहानियों का मुख्य विषय बनाया है।🌷यह संग्रह समाज में बढ़ती असुरक्षा, विस्थापन, यादों और भरोसे के टूटने की कहानियों का संकलन है।

R
Ritesh thakur
समाज और मानव की दरारों में झांकती एक साहसी और सच्ची किताब

नफ़रत के इस दौर में उम्मीद, प्रेम और सह-अस्तित्व की कहानियाँ ज़िंदा हैं। तसनीम ख़ान की यह किताब पाठक को सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और खुद से सवाल करने के लिए मजबूर करती है।मानवीय भावनाओं और रिश्तों को लेखिका ने बहुत बेहतर तरीके से बुना है

S
Sahitay sangrah
समीक्षा

किताब-बवालिस्तानलेखिका- तसनीम ख़ानआप इस किताब के नाम से अंदाजा नहीं लगा सकते कि इसकी कहानियां आपको एक समंदर जितनी गहरी सोच में डूबा सकती है।🌻कहानी का हर पहलू इतनी सत्यता का प्रतीक लगता है,इतनी मार्मिक है इस किताब की कहानियाँ की भावुक होना लाज़मी हो जाएगा।🌻यह किताब सिर्फ़ कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक पूरे दौर की मानसिक, सामाजिक और निजी उथल-पुथल का दस्तावेज़ है,जहाँ दर्द सिर्फ़ अनुभव नहीं, बल्कि सृजन का स्रोत बन जाता है।🌻लेखिका शुरुआत में ही एक गहरी बात रखती हैं।खुशी की कोई कहानी नहीं होती, क्योंकि खुशी शब्दों से परे एक स्थिति है,जबकि दुःख और विरह ही कथा को जन्म देते हैं। यही विचार पूरे संग्रह की आत्मा बनकर चलता है।🌻यहाँ कहानियाँ गढ़ी नहीं गईं, बल्कि जी गई हैं—और यही इनकी सबसे बड़ी ताकत है।🌻इस संग्रह की खासियत इसकी ईमानदारी है।🌻लेखिका अपने व्यक्तिगत दुःख—पिता के निधन और सामाजिक अविश्वास के अनुभव को छुपाती नहीं, बल्कि उन्हें ही लेखन की जमीन बनाती हैं। यह निजी से सामाजिक और फिर राजनीतिक तक का सफर बेहद सहजता से तय होता है। अब तुम्हारा क्या होगा?” जैसा एक साधारण-सा सवाल जिस तरह भीतर की दरार को खाई में बदल देता है,जो पाठक को झकझोर देता है।🌻कहानियों के शीर्षक ही अपने आप में संकेत हैं कि यह संग्रह किस तरह के यथार्थ से टकराने वाला है—अब्दुल की मौत, भुखमरी की नगरी में दिवाली, ख़ामोशियों का रंग नीला, बवालिस्तान ये सब मिलकर उस समाज की तस्वीर बनाते हैं जहाँ दर्द व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है।🌻लेखिका का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से प्रतिरोध का है,खासतौर पर स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार और धर्म के नाम पर थोपे गए अन्याय के खिलाफ। लेकिन यह प्रतिरोध आक्रोश से ज्यादा संवेदना और तर्क से भरा है। 🌻यही वजह है कि इस किताब की कहानियाँ कहीं भी बनावटी नहीं लगती बल्कि अनुभव की सच्चाई बताती है।🌻इस संग्रह की एक और महत्वपूर्ण बात है—इसका उर्वरता वाला विचार।🌻लेखिका मानती हैं कि यह दौर जितना भी कठिन क्यों न हो, उसने कहानियों की जमीन को और उपजाऊ बनाया है। दर्द यहाँ सिर्फ़ तोड़ता नहीं, बल्कि रचता भी है।🌻भाषा सरल होते हुए भी प्रभावशाली है। कहीं-कहीं यह आत्मकथात्मक लगती है, तो कहीं सामाजिक दस्तावेज़ जैसी।🌻सारी कहानियाँ राजस्थान के इलाकों शहरों के इर्द गिर्द घूमती है जिसमें राजस्थान की बोली वहाँ के रहन सहन को बड़ी सहजता से दर्शाया गया है।🌻लेखिका पाठक को सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और असहज होने के लिए मजबूर करती हैं।🌻यह किताब उन लोगों के लिए है जो साहित्य में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि सच की तलाश करते हैं।🌻 यह किताब बताती है कि कहानियाँ सिर्फ़ कही नहीं जातीं वे जी जाती हैं, सहन की जाती हैं, और फिर शब्दों में ढलती हैं।🌻अगर आप दर्द, प्रतिरोध और उम्मीद—तीनों को एक साथ महसूस करना चाहते हैं, तो यह किताब आपको खाली नहीं छोड़ेगी।🌻किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा।

R
Raj kumar
सामाजिक मुद्दों, राजनीति पर लिखी व्यंग्यात्मक और मार्मिक कहानियों का संग्रह

किताब : बवालिस्तान (कहानी संग्रह)लेखिका : तसनीम ख़ानप्रकाशक : युवान बुक्स (unbound script का उपक्रम)प्रथम संस्करण : 2026कुल पृष्ठ : 230भारत की संस्कृति और सामाजिक संरचना कई अलग अलग विचाधाराओं के धागों से गुत्थी हुई है जहां खाने पीने से लेकर भाषा, नाच, वेश भूषा, बोली इत्यादि में भिन्नता होने के पश्चात भी हमनें अपने इतिहास से आज के इस AI के दौर तक का सफ़र तय किया है। इस लंबी यात्रा में धर्म , मजहब और राजनीति ने जितना नुक़सान इंसानियत का किया है उससे कई गुना भला देश के नेताओं का किया है, इन नेताओं में आप अपनी समझ और विचारधारा के अनुसार जिसे अच्छा बुरा मानना चाहे मान सकते हैं। और इसी नुकसान के बदौलत भारत के उस सामाजिक ताने बने में जो दरारें फूटी है उन्हीं दरारों से रिसकर बहती हुई कुछ कहानियों को लेखिका तसनीम ख़ान ने अपने कहानी संग्रह "बवालिस्तान" में पिरोने की कोशिश की है। कुल जमा 15 कहानियों को समेटे ये संग्रह धर्म/मज़हब, राजनीति, और पितृसत्तात्मक सोच से जन्मे द्वेष, आक्रोश, और नफ़रत की महामारी से जूझते हिंदू मुस्लिम एकता पर चोट करती हुई घटनाओं को दिखाती है , इसके साथ ही कुछ कहानियां जैसे "दुनियावी ख़ुदा , रूख़ ए गुलज़ार, और मेरे हिस्से की चांदनी" मुस्लिम समाज और परिवारों में महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य और रिवाजों पर भी खुलकर बात करती है। तो वहीं कहानियां जैसे "अब्दुल की मौत, पैरों में पीर उठी है...., भाईसाहब और राज़ीनामा" हिन्दू मुस्लिम एकता के साथ आपसी प्रेम और राजनीति के चलते उस पर होने वाली चोट के नुकसान के परिणामों को भी सामने लाती है। कुछ कहानियां जैसे "बवालिस्तान, भुखमरी की नगरी में दिवाली और नफ़ा - नुकसान" महामारी, कश्मीर से एक धारा के हटने और समाज में फैली नफ़रत को जरूरी सवालों और व्यंग्य के साथ ही एक मार्मिक नजरिए से भी आपके सामने रखने के प्रयास करती है। इसके अलावा "दो रातें, इकलौती याद " तथा "बगुले की चोंच और दिल्ली दरवाज़ा" दोनों ही कहानियां प्रेम कहानियों की तरह तो नहीं लिखी गई है मगर प्रेम की बात करती है प्रेम के ना पूरा होने की कसक की भी बात करती है और वो आज़ादी जिसे आज भी महिलाएं कुछ तबकों तक ही फैला पाई है उसे पाने की बात करती है ये दोनों कहानियां।लेखन की बात करें तो आपको इसमें व्यंग्य, भाषाई विविधता, और सोशल मीडिया से उपजे शब्दकोश का उपयोग देखने को मिलता है जो कहानियों को जरूरी भावात्मक गहराई तो प्रदान करता ही है साथ ही पाठकों को रचनात्मक संतुष्टि भी देता है। राजस्थान की धरती और शहरों गांवों का नाम कहानियों में पढ़ना मेरे लिए काफी सुखद रहा और मेरे जन्मस्थान जोधपुर से जुड़ी कहानी ,मेरे घर की याद को और गाढ़ा कर गई।तसनीम ख़ान जी को उनकी इस किताब के लिए ढेरों शुभकामनाएं।- साहित्ययात्री(१४/०४/२०२६)

S
Saba
बवालिस्तान-“ यह शीर्षक समाज, राजनीति, मीडिया और मानवीय संघर्षों से भरे परिवेश की ओर संकेत करता है।

यह किताब पत्रकारिता, समाज और समकालीन मुद्दों पर आधारित व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक लेखन मानी जाती है।तस्नीम ख़ान की लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और सामाजिक पहलुओं को उजागर करने वाली है।

J
Jawed Siddiqui
Really good book

Really a good novel ,its recomended for reading. It tells about realities which everyone should read and acknowledge the social evils ⭐⭐⭐⭐⭐

N
Naved
Must Read

The way the author connects real issues with deep insights makes the book both informative and emotionally powerful. It not only reflects the ground realities of our society but also encourages readers to think critically about them.

p
prakash
बेहतरीन

मानवीय भावनाओं और रिश्तों को लेखिका ने बहुत बेहतर तरीके से बुना हैहृदयस्पर्शी, मार्मिक और संवेदनाओं से भरी हुई must read