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Rajyog | राजयोग

Yuvaan Books

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वेदान्त का सबसे उदात्त तत्त्व यह है कि हम एक ही लक्ष्य पर भिन्न-भिन्न मार्गों से पहुँच सकते हैं। स्वामी जी ने इन्हें साधारण रूप से चार मार्गों में विभाजित किया है- कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । परन्तु वे इन्हें बिल्कुल पृथक्-पृथक् विभाग नहीं मानते। वे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं कि तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिले, जिसमें कर्म करने के अतिरिक्त दूसरी कोई शक्ति न हो, अथवा जिसमें केवल भक्ति या केवल ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ न हो। ये विभाग उन्होंने केवल मनुष्य की प्रधान प्रवृत्ति अथवा गुण प्राधान्य के अनुसार किये हैं। ये सब मार्ग एक ही लक्ष्य में जाकर एक हो जाते हैं।
अनेक मार्गों में से एक मार्ग है-'राजयोग'। मानव मन के विज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाने वाली एक खोज है। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र पर आधारित स्वामी जी की यह पुस्तक हमें सिखाती है कि कैसे एकाग्रता, ध्यान और मानसिक अनुशासन के माध्यम से हम अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण पा सकते हैं और अपनी छिपी हुई शक्तियों को जाग्रत कर सकते हैं। यह ग्रंथ किसी को अंधविश्वास या रूढ़िवादिता में बंधने के लिए नहीं कहता, बल्कि इसे विज्ञान मानता है, जिसे हर व्यक्ति अपने जीवन में प्रयोग करके देख सकता है।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Genre Religion & spirituality
Edition 1ST
ISBN 9788169235389
Year 2026
Format Paperback
Pages 192
Language Hindi

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