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Samvidhan Sabha Mein Adivasi | संविधान सभा में आदिवासी

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‘संविधान सभा में आदिवासी’ यह किताब साबित करती है कि आदिवासियों ने सारी लड़ाइयाँ सिर्फ़ तीर और कमान से नहीं लड़ीं, बल्कि कई ज़रूरी लड़ाइयाँ उन्होंने सामुदायिक अपने और ज्ञान के दम पर जीतीं। डॉ. जितेंद्र मीणा अपनी इस किताब में दिखाते हैं कि आदिवासी नेताओं ने अपनी प्रतिभा के बल पर अपने समाज के लिए संवैधानिक संरक्षण हासिल करने के साथ ही साथ संविधान में बराबरी और न्याय की धारणा को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन हमारा इतिहास इसे हासिए पर भी दर्ज करने लायक नहीं समझता! इन नायकों की उपेक्षा का कोई कारण तो होगा? डॉ. जितेंद्र मीणा इतिहास के पन्नों से उपनिवेशवादी और वर्चस्ववादी पर्दों को हटाकर आदिवासियों के अतीत को स्वायत्त रूप में देखने और उसकी पुनर्रचना करने को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। उनका मानना है कि किसी समुदाय के इतिहास को उपनिवेश इसलिए बनाया जाता है ताकि भविष्य की पीढ़ियों को गुलाम रखा जा सके। उनकी पहली पुस्तक ‘राष्ट्र निर्माण में आदिवासी’ हिंदी में बेस्टसेलर रही थी और एकाधिक भारतीय भाषाओं में अनूदित हो चुकी है।

यह किताब संविधान सभा में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका के साथ पूरी सभा का चलचित्र लगती है। उसके भीतर चल रहे घात-प्रतिघात साफ़ दिखाई पड़ने लगते हैं।

किताब की भाषा बहुत पठनीय है और इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण आदिवासी प्रतिनिधियों का रेखांकन पहली बार देखने को मिलेगा।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Genre History
Edition 1ST
ISBN 9788169235402
Year 2026
Format Paperback
Pages 360
Language Hindi

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संविधान सभा में आदिवासी

संविधान सभा में आदिवासी’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जो संविधान निर्माण की प्रक्रिया को आदिवासी दृष्टिकोण से समझने का अवसर देती है। यह किताब उन आवाज़ों और सवालों को सामने लाती है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास में अक्सर पर्याप्त जगह नहीं मिली।जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, स्वशासन और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों के ऐतिहासिक संदर्भ को समझने के लिए यह पुस्तक बेहद जरूरी है। यह केवल इतिहास को जानने की किताब नहीं, बल्कि वर्तमान में आदिवासी समाज के संघर्ष और अधिकारों को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है।

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“संविधान सभा में आदिवासी” एक महत्वपूर्ण और शोधपरक पुस्तक है, जो भारतीय संविधान निर्माण में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका, विचारों और योगदान को सामने लाती है। पुस्तक आदिवासी इतिहास और संवैधानिक विमर्श को समझने के लिए बेहद उपयोगी है। इतिहास, संविधान और आदिवासी समाज में रुचि रखने वाले पाठकों को इसे जरूर पढ़ना चाहिए।