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Paavati Kaun Dega | पावती कौन देगा By Priy

Rs. 269
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प्रिय का सधा हुआ चमकदार गद्य उनके व्यंग्य को वह ज़रूरी धार मुहैया कराता है जिसकी अनुपस्थिति में इस तरह के लेखन के सामने दोहराव का जोखिम बना रहता है। उनके लेखन में जीवन से सीधी मुठभेड़ करते आमजन के लिए स्पष्ट प्रतिबद्वता तो नज़र आती ही है, उनके अध्ययन के विस्तृत और दिलचस्प दायरे की झलक भी मिलती है। वे बड़ी आसानी से भाषा और शैलियों के अलग-अलग रास्तों में आवाजाही करना जानते हैं और उनकी चपल और संवेदनशील दृष्टि चीज़ों के आरपार देखने का हौसला रखती है। प्रिय का यह पहला संग्रह समकालीन साहित्य में उनकी मजबूत उपस्थिति को दर्ज करेगा। -अशोक पाण्डे प्रिय हिन्दी व्यंग्य की उम्मीद हैं। उनके लेखन में राजनीतिक जुमलों से भरमाने वाली अभिव्यक्ति नहीं बल्कि उससे आगे निकलता सहज परिहास है। बीते अनेक दशकों से व्यंग्य के नाम पर बौद्विक कुण्ठा परोसी जा रही थी। कभी-कभी कुण्ठा के ऐसे ही प्रस्तुतिकरण को राजनीतिक चेतना भी कह दिया जाता रहा है। प्रिय की लिखत में सिर्फ राजनीति नहीं, हमारे आसपास का आम परिवेश है। प्रिय, तुम ‘पारसाई’ से बचते हुए हमाम की हलचल बताते रहो।

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Book Details

Publisher Yuvaan Books
Genre Comics & graphic novels and Humor & comedy
Edition 1st
ISBN 9789348497680
Year 2025
Format Paperback
Pages 216
Language Hindi

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  • 5 stars: 4 (80%)
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K
Kshitij Sharma
बढियां व्यंग्य

बहुत दिनों बाद इतना तीक्ष्ण और सटीक व्यंग्य पढ़ने को मिला। ज्यादा सुखद यह है कि लेखक नए युग का है। मतलब हिंदी साहित्य की स्थिति सुधर सकती है, आशाएं बाकी हैँ। साधुवाद लेखक 👌

भ
भूपेंद्र भारतीय
मजेदार व्यंग्य संग्रह

अच्छी व्यंग्य पुस्तक है।

M
Manisha
उम्मीद से भरे व्यंग❤️

हंसाने के लिए सस्ती भाषा से इतर उत्कृष्ट व्यंग की राह पर ले जाती है ये किताब❤️

P
Placeholder
Superb

Very nice book

S
Shankh Dhar
बेहद महत्वपूर्ण किताब

इस किताब को मैं शुद्ध व्यंग्य की घर वापसी के तौर पर देखता हूं।इधर व्यंग्य के साथ बहुत छेड़छाड़ हुई है। सीधे सपाट और दोहराव और भी पता नहीं क्या क्या परोसा जा है जो कुछ भी और हो सकता है पर व्यंग्य नहीं होता है।इन व्यंग्यों से गुजरना आश्वस्त कारक है।इनका स्वागत होना चाहिए।