'गोदान' का होरी और 'रंगभूमि' का सूरदास दोनों ही छले गए पात्र हैं। एक को ज़मीदारों ने सूद के बोझ तले दबा दिया तो दूसरे को उसके घर से बेघर करने को कभी गाँव वालों ने साज़िश की तो कभी फैक्ट्री के मजदूरों के घर बनाने की ख़ातिर पॉड़ेपुर मोहल्ले की ज़मीन हथियाने के लिए पुलिस लगा दी गयी। होरी भरी दुपहरिया में काम करते हुए लू लगने से और कमज़ोर हो जाने के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठा और उसकी गाय पालने की इच्छा पूर्ण न हो सकी वहीं सूरदास को मि. क्लार्क द्वारा गोली से मार गिराया गया। मृत्यु ही दोनों के जीवन में आराम ला सकीं। दोनों ही अपने से पहले दूसरों के लिए जान न्योछावर करते थे।गोदान एक किसान के अधूरे सपने की कहानी है , एक ऐसी पत्नी की कहानी है जिसने मरते दम तक अपनी मर्यादा नहीं त्यागी और सदा स्वाभिमान के साथ जीवन अर्पण किया। गोदान कहानी है एक ऐसे बेटे की जो अपने बाप का अधूरा सपना पूर्ण न कर सका और अंत में उसके पास देने को सिर्फ़ और सिर्फ़ सांत्वना ही बचा। गोदान को पढ़ते हुए गाँव का सामाजिक परिवेश खुल कर सामने आता है, लोगों के मन में निहित भ्रष्टाचार और भारतीय समाज में व्यापक ज़मींदारी प्रथा के बारे में पता लगता है। गोदान उपन्यास को आप दो भागों में विभाजित कर सकते हैं एक ग्रामीण परिवेश और दूसरा शहरी परिवेश। ग्रामीण परिवेश में आप होरी का संघर्ष देख पायेंगे, गाँव में फैली छुआछूत की बीमारी महसूस कर पायेंगे, ज़मींदारी प्रथा से रूबरू हो पायेंगे, भारतीय समाज की शादी शुदा गृहस्थी को कैसे चलाया जाता है उसका एक सजीव चित्रण देखने को मिलेगा और साथ ही गाँव में मौजूद अशिक्षा देखने को मिलेगी।वहीं शहरी परिवेश में मुख्य किरदार मेहता और मालती की कहानी आप की आँखें नम कर देंगी। आप देखेंगे कि किस तरह डॉक्टर मालती कहानी के आरंभ में एक रसभरी पुष्प की भांति कितने ही मधुमखियों को अपनी और आकर्षित करती है लेकिन अंत में उसका पूरा चरित्र ही बदल जाता है और वो मेहता के संपर्क में आने के कारण जन सेवा में लीन हो जाती है। आप को मिस्टर तंखा जैसे मक्कार दिखेंगे जो दो दोस्तों में लड़ाई लगवा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। आप को मिस्टर खन्ना और गोविन्दी के गृहस्थ जीवन में झाँकते हुए आप को पता लगेगा कि जब दूसरी लड़कियों से भाव न मिला तो वे लौट कर अपनी पत्नी के पास आये और उनकी महानता को स्वीकार किया।आज के परिप्रेक्ष्य में अगर आप देखेंगे तो पायेंगे कि मेहता के भाषण और उनके वैचारिक दृष्टिकोण महिलाओं को घर के कामों में व्यस्त रखने के पक्ष में थे। वे पूर्ण रूप से तो स्त्री जाति से द्वेष नहीं करते थे परन्तु अपने दिमाग़ में इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित कर चुके थे कि जीव जन्तुओं को पालने का काम बहुत बड़ा काम है और साक्षात महानता का पर्याय है जो सिर्फ़ स्त्री कर सकती है इस कारण उनका चुनाव घर पर रह कर परिवार संभालने के लिए हुआ है। उन्हें स्त्री में त्याग, धैर्य, परोपकार जैसे गुण बहुत ज़रूरी नज़र आते थे। इसके विपरीत मालती की बहन सरोज इस बात को ग़लत मानती थी और स्त्रियों के काम काज का क्षेत्र बढ़े इसपर जोर देती थी।धनिया अपने समय से आगे का सोचती है। वो सिर्फ़ अपनी जाति के लिए नहीं पूरी मानव जाति के लिए एक मिशाल है। उपन्यास में अनेक जगह ऐसे प्रसंग मिले जिसने इस बात पर मोहर लगा दी जैसे झुनिया का गर्भवती होने के उपरांत उसने उसे अपने घर में सिर्फ़ जगह ही नहीं दी बल्कि उसका पालन पोषण किया और पूरे गाँव वालों से लड़ गयी कि जाति वाले बिरादरी वाले हमें अलग करते हैं तो करें हम मानवता नहीं त्याग सकते हैं। उसने सिलिया चमारिन को भी अपने घर में पनाह दी और बार बार बताया कि वो जातिवादके चँगुल में नहीं फँसी है।/ तरुण पाण्डेय